साँझा चूल्हा


रज्जी और रीत..पंजाब के एक छोटे से गांव में रहने वाले दो अलग अलग घरों की बहुएं लेकिन परिवार कहीं ना कहीं एक ही था| दोनों की जान बसती थी एक दूसरे में , गाढ़ी दोस्ती लेकिन शायद किसी को खबर भी नहीं होगी इस दोस्ती की|
घर के काम करते करते बस दोनों को बेसब्री इंतजार रहते दोपहर के खाने का जब सब परिवारों की औरतें उस साँझा चूल्हे पर रोटी सेकने आती| रोटी सेकते सेकते ना जाने कब उस चूल्हे की गरमाई में दोस्ती भी पकने लगी और मन की बातों की खशबू एक दूसरे तक पहुंचने लगी , वो मन की बातें जो परिवार में कोई नहीं सुनता था या किसी को पड़ी भी नहीं थी उनकी बातें सुनने की|

बातें ओढ़नी , दुप्पटे के घोटों, सितारों से लेकर मायकों की गलियों से होते हुए..तुझे पता है वहां ऐसा होता है..से वापिस सांझे चूल्हे के पास आ जाती|
रज्जी और रीत एक दूसरे में ही आपने मायका खोजती थी, दिन यूँ ही बीतते गए|

ज़मीन के एक टुकड़े पर हुई घर के पुरषों की उस अभिमान की लड़ाई ने रज्जी और रीत की दोस्ती को ही दांव पर रख दिया| लड़ाई ऐसी बढ़ी के दोनों परिवारों में बोलचाल बंद हो गयी| अब ना चूल्हा साँझा रहा और ना ही बातें |
रज्जी और रीत का मिलना अब बंद ही हो चूका था| रज्जी दिन भर दिन उदास रहने लगी ज़िम्मेदारियों के साथ साथ मन की बातों का बोझ भी अब बढ़ने लगा था जो किसी को नहीं दिख रहा था सिवाय रज्जी की बीजी(दादी सास) की बूढी आँखों के|

एक दिन अचानक रीत के घर के आगे जाते ही बीजी बेहोश हो गयी रीत और उसके पति ने ही उन्हें समय से हस्पताल पहुंचाया| रज्जी की मूक बहती आँखे रीत को धन्यवाद दे रही थी| उनके इस अहसान ने ज़मीन का समझौता तो करवा दिया लेकिन दिल के समझौते अभी भी बाकी ही थे|

एक दिन सुबह उठे तो गली के सभी घरों के चूल्हे फूटे हुए मिले सिवाय उस साँझे चूल्हे के| सब लोग इक्ट्ठा हुए कोई ना जान पाया के किसने किया और क्यों किया| लेकिन २ लोग ऐसे भी थे जो ये सब जानना ही नहीं चाहते थे..रज्जी और रीत..वो तो बस इस उम्मीद में थी के शायद साँझा चूल्हा फिर से उनकी दोस्ती की खुशबू फैला देगा| बीजी के सुझाव पर फिर से चूल्हे पर रोटियां सेकनी चालू कर दी गयी|

आज फिर बातें ओढ़नी , दुप्पटे के घोटों, सितारों से लेकर मायकों की गलियों से होते हुए..तुझे पता है वहां ऐसा होता है..से वापिस सांझे चूल्हे के पास आ गयी | और दूसरी तरफ आज उनके साथ साथ बीजी भी मुस्करा रही थी उस साँझे चूल्हे की रोटियां खा कर|

आपकी जानकारी के लिए साँझा चूल्हा पंजाब की खूबसूरत परंपराओं में से एक है।पुराने दिनों में (और कुछ छोटे गांवों में आज भी)  सभी महिलाएं अपने घर पर किसी प्रकार की दाल / सब्जी बनाती थी , पारिवारिक एकता को बनाये रखने के लिए  सभी महिलाएं अपने घर से आटा लाकर  रोटियों को एक साथ  एक प्रकार के तंदूर पर पकाती थी ।

चित्र साभार: गूगल (पिनटेरेस्ट)  |

धन्यवाद 

सुमित कौशिक भारद्वाज |

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