क्या भारतीय महिलाएं स्वतंत्र हैं?

मात्र कुछ महिलाओँ को देखकर हम खुश हो जाते हैं कि समाज तेजी से बदल रहा है, महिलाएं स्वतंत्र हो रही हैं।

क्या वास्तव में महिलाएं स्वतंत्र हो रही है ?

क्या वे सामाजिक रूप से स्वतंत्र हैं ?

जिस पुरुष प्रधान देश के पुरुष ही सामाजिक रूप से स्वतंत्र नहीं है वहां की महिलाएं कैसे सामाजिक रूप से स्वतंत्र हो सकती हैं ? सामाजिक रूप से स्वतंत्र होने में तो महिलाओं को कई सदियों का इंतजार करना पड़ेगा।

क्या आर्थिक स्वतंत्रता ही महिलाओं की स्वतंत्रता है ?

महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं लेकिन क्या वे सामाजिक रूप से आज़ाद हो रही हैं ? आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता समकक्ष नहीं हैं। जरूरी नहीं है कि जो महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, वे समाजिक रूप से भी स्वतंत्र हैं | बड़ी-बड़ी कंपनियों में नौकरी करने वाली, विदेशों में रहने वाली,अपने व्यापार चलाने वाली, जाने कितनी महिलाएं हैं जिन्हें देखकर हमें लगता है कि ये कितनी स्वतंत्र हैं। लेकिन क्या हम जानते हैं कि उन्हें यहां तक पहुंचने में कितनी सामाजिक लड़ाइयां लड़नी पड़ी? क्या हम जानते हैं कि वे प्रतिदिन कितने सामाजिक या मानसिक तनाव से गुजरती हैं? हम कुछ महिलाओं के छोटे कपड़ों को देखते हैं हमें लगता है कि कितनी स्वतंत्र हैं लेकिन क्या हम जानते हैं कि उनके साथ घर में कैसा सलूक होता होगा?

क्या है सामाजिक स्वतंत्रता ?

हम तब तक सामाजिक रूप से आज़ाद नहीं हैं जब तक हम ये कहते हैं :

“ मेरे माता पिता ने मुझे पढ़ने दिया । ”

“ मेरी ससुराल वाले मुझे नौकरी करने दे रहे हैं।”

“मेरे माता पिता मेरी पसंद के लड़के से मेरी शादी करने के लिए राज़ी हो गए”।

जब हमारे मूलभूत अधिकारों को दिए जाने या ना दिए जाने का निर्णय कोई और ले रहा है तो हम स्वतंत्र कहां हुए? कुछ मामलों में तो पुरुषों को भी ये अधिकार नहीं मिलते।

वास्तविक स्वतंत्रता तो तभी होगी जब हमें अपने निर्णय खुद लेने के काबिल बनाया जाएगा, हम ख़ुद अपने निर्णय लेने में सक्षम होंगे, तथा हमारे निर्णयों को मात्र इस कारण से संशय की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा कि ये महिलाओं द्वारा लिए गए निर्णय हैं।

image credit :google

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