महिला दिवस का औचित्य

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस आया और चला गया।

क्या कुछ बदल गया?

क्या आज भ्रूण हत्याओं की संख्या कल की अपेक्षा कम होगी?

क्या आज बलात्कारों की संख्या कल से कम होगी?

क्या आज कोई महिला शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न का शिकार नहीं हुई होगी?

कल बहुत सारे महिला संबंधी कार्यक्रमों का आयोजन हुआ होगा , बहुत सारी गोष्ठियां हुई होंगी, बहुत सारे लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए होंगे, बहुत सारे लोगों ने ब्लॉग्स या सोशल मीडिया पर महिलाओं के बारे में लिखा होगा, आज भी लिख रहे हैं । क्या ये विचार वास्तव में किसी को सोच को प्रभावित करते हैं? कितने लोग इनसे प्रभावित होकर अपनी सोच बदल लेंगे? सकारात्मक होकर भी सोचो तो शायद 100 में से कोई दो या तीन।

अगर यही विचार किसी के माता-पिता व्यक्त करें तो कितने बच्चे अपने विचार बदल लेंगे ? कितने बच्चे इन विचारों को अपना कर अपने जीवन का हिस्सा बना लेंगे और इन विचारों को आगामी पुस्तों तक बढ़ाएंगे ? कम से कम 100 में से 50 या इससे भी अधिक।

महिला दिवस का औचित्य तभी सिद्ध होगा जब इसे पारिवारिक स्तर पर मनाया जाएगा। जब हर दिन किसी ना किसी परिवार के सदस्य यह घोषणा करेंगे कि आगे से :

उनके परिवार में कोई भ्रूण हत्या नहीं होगी।

उनके परिवार में लड़के और लड़की में कोई भेदभाव नहीं होगा ।

उनके परिवार में ना दहेज लिया जाएगा ना दहेज दिया जाएगा ।

उनका परिवार अपने बच्चों को अपने निर्णय लेने की सामाजिक स्वतंत्रता देगा।

उनका परिवार बच्चों को किसी अन्य के विचारों का समर्थन करना सिखाएगा ( बिना लिंग भेद के) ।

जब तक हर महिला और पुरुष, महिला दिवस में भागीदारी नहीं करता तब तक महिला दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं।


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